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वन पर्व
अध्याय १२८
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लोमश उवाच
स चकार तथा सर्वं राजा राजीवलोचनः |  १७   क
पुनश्च लेभे लोकान्स्वान्कर्मणा निर्जिताञ्शुभान् |  १७   ख
सह तेनैव विप्रेण गुरुणा स गुरुप्रिय़ः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति