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अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
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महेश्वर उवाच
एष द्विजजने धर्मो गार्हस्थ्यो लोकधारणः |  ४५   क
द्विजातीनां सतां नित्यं सदैवैष प्रवर्तते ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति