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आदि पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्तस्ततः कर्णः किञ्चित्प्रस्फुरिताधरः |  ८   क
गगनस्थं विनिःश्वस्य दिवाकरमुदैक्षत ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति