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अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
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युधिष्ठिर उवाच
अय़ं नाराय़णः श्रीमान्सर्वपार्थिवसंमतः |  ५   क
भवन्तं वहुमानेन प्रश्रय़ेण च सेवते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति