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अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
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भीष्म उवाच
श्रोत्रिय़ांश्च विकर्मस्थान्प्राज्ञांश्चाप्यजितेन्द्रिय़ान् |  ३७   क
मन्येऽनुध्याय़सि जनांस्तेनासि हरिणः कृशः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति