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उद्योग पर्व
अध्याय १२४
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वैशम्पाय़न उवाच
रत्नौषधिसमेतेन रत्नाङ्गुलितलेन च |  १४   क
उपविष्टस्य पृष्ठं ते पाणिना परिमार्जतु ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति