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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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धृतराष्ट्र उवाच
एकरात्रेण मान्धाता त्र्यहेण जनमेजय़ः |  १६   क
सप्तरात्रेण नाभागः पृथिवीं प्रतिपेदिवान् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति