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द्रोण पर्व
अध्याय १२१
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सञ्जय़ उवाच
स तु गाण्डीवनिर्मुक्तः शरः श्येन इवाशुगः |  ३२   क
शकुन्तमिव वृक्षाग्रात्सैन्धवस्य शिरोऽहरत् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति