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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
कथं जीवति दुर्धर्षे त्वय़ि राधेय़ फल्गुनः |  १८   क
अनस्तङ्गत आदित्ये हन्यात्सैन्धवकं नृपम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति