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वन पर्व
अध्याय १२०
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सात्यकिरु उवाच
खड्गेन चाहं निशितेन सङ्ख्ये; काय़ाच्छिरस्तस्य वलात्प्रमथ्य |  ९   क
ततोऽस्य सर्वाननुगान्हनिष्ये; दुर्योधनं चापि कुरूंश्च सर्वान् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति