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शान्ति पर्व
अध्याय १२०
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भीष्म उवाच
धनं भोज्यं पुत्रदारं समृद्धिं; सर्वो लुव्धः प्रार्थय़ते परेषाम् |  ४६   क
लुव्धे दोषाः सम्भवन्तीह सर्वे; तस्माद्राजा न प्रगृह्णीत लुव्धान् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति