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शान्ति पर्व
अध्याय १२०
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भीष्म उवाच
हरेत्कीर्तिं धर्ममस्योपरुन्ध्या; दर्थे दीर्घं वीर्यमस्योपहन्यात् |  ३८   क
रिपुर्द्वेष्टा दुर्वलो वा वली वा; तस्माच्छत्रौ नैव हेडेद्यतात्मा ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति