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शल्य पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
ततः सविशिखं चापं सहदेवस्य धन्विनः |  ८   क
छित्त्वा भल्लेन समरे विव्याधैनं त्रिसप्तभिः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति