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द्रोण पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
आस्तां ते स्तिमिते सेने रक्ष्यमाणे परस्परम् |  २१   क
सम्प्रसुप्ते यथा नक्तं वनराज्यौ सुपुष्पिते ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति