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वन पर्व
अध्याय १२
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विदुर उवाच
तावन्योन्यं समाश्लिष्य प्रकर्षन्तौ परस्परम् |  ५३   क
उभावपि चकाशेते प्रय़ुद्धौ वृषभाविव ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति