वन पर्व  अध्याय १२

विदुर उवाच

तं शिलाताडनजडं पर्यधावत्स राक्षसः |  ५२   क
वाहुविक्षिप्तकिरणः स्वर्भानुरिव भास्करम् ||  ५२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति