आश्रमवासिक पर्व  अध्याय १२

धृतराष्ट्र उवाच

एवं त्वय़ा कुरुश्रेष्ठ वर्तितव्यं प्रजाहितम् |  २०   क
उभय़ोर्लोकय़ोस्तात प्राप्तय़े नित्यमेव च ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति