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शान्ति पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
निहत्य शत्रूंस्तरसा समृद्धा; न्शक्रो यथा दैत्यवलानि सङ्ख्ये |  ३५   क
कः पार्थ शोचेन्निरतः स्वधर्मे; पूर्वैः स्मृते पार्थिव शिष्टजुष्टे ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति