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शान्ति पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्तर्वहिश्च यत्किञ्चिन्मनोव्यासङ्गकारकम् |  ३३   क
परित्यज्य भवेत्त्यागी न यो हित्वा प्रतिष्ठते ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति