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वन पर्व
अध्याय ११९
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वैशम्पाय़न उवाच
सत्रे समृद्धेऽति रथस्य राज्ञो; वेदीतलादुत्पतिता सुता या |  २०   क
सेय़ं वने वासमिमं सुदुःखं; कथं सहत्यद्य सती सुखार्हा ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति