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वन पर्व
अध्याय ११८
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वैशम्पाय़न उवाच
स तत्र तामग्र्यधनुर्धरस्य; वेदीं ददर्शाय़तपीनवाहुः |  १०   क
ऋचीकपुत्रस्य तपस्विसङ्घैः; समावृतां पुण्यकृदर्चनीय़ाम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति