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अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
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कीट उवाच
धनं धान्यं प्रिय़ान्दारान्यानं वासस्तथाद्भुतम् |  २३   क
श्रिय़ं दृष्ट्वा मनुष्याणामसूय़ामि निरर्थकम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति