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वन पर्व
अध्याय ११७
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अकृतव्रण उवाच
तां कश्यपस्यानुमते व्राह्मणाः खण्डशस्तदा |  १३   क
व्यभजंस्तेन ते राजन्प्रख्याताः खाण्डवाय़नाः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति