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अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
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भीष्म उवाच
न हि प्राणात्प्रिय़तरं लोके किञ्चन विद्यते |  ११   क
तस्माद्दय़ां नरः कुर्याद्यथात्मनि तथा परे ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति