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शान्ति पर्व
अध्याय ११७
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भीष्म उवाच
दत्त्वा च ते सुखप्रश्नं सर्वे यान्ति यथागतम् |  ८   क
ग्राम्यस्त्वेकः पशुस्तत्र नाजहाच्छ्वा महामुनिम् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति