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भीष्म पर्व
अध्याय ११५
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सञ्जय़ उवाच
ततो द्रोणाय़ निहतं भीष्ममाचष्ट कौरवः |  २४   क
द्रोणस्तदप्रिय़ं श्रुत्वा सहसा न्यपतद्रथात् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति