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वन पर्व
अध्याय ११५
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अकृतव्रण उवाच
वने तु तस्य वसतः कन्या जज्ञेऽप्सरःसमा |  १०   क
ऋचीको भार्गवस्तां च वरय़ामास भारत ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति