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शान्ति पर्व
अध्याय ११५
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भीष्म उवाच
मनुष्यशालावृकमप्रशान्तं; जनापवादे सततं निविष्टम् |  १६   क
मातङ्गमुन्मत्तमिवोन्नदन्तं; त्यजेत तं श्वानमिवातिरौद्रम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति