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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
एवं तं विरथं कृत्वा कर्णो राजन्व्यकत्थत |  ८०   क
प्रमुखे वृष्णिसिंहस्य पार्थस्य च महात्मनः ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति