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भीष्म पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
सञ्ज्ञां चैवालभद्वीरः कालं सञ्चिन्त्य भारत |  ८७   क
अन्तरिक्षे च शुश्राव दिव्यां वाचं समन्ततः ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति