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भीष्म पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
एवं कुरूणां पतिते शृङ्गे भीष्मे महौजसि |  १०१   क
पाण्डवाः सृञ्जय़ाश्चैव सिंहनादं प्रचक्रिरे ||  १०१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति