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द्रोण पर्व
अध्याय ११३
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सञ्जय़ उवाच
भीमनामाङ्किता वाणाः स्वर्णपुङ्खाः शिलाशिताः |  ५   क
विविशुः कर्णमासाद्य भिन्दन्त इव जीवितम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति