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द्रोण पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
स रवस्तस्य शूरस्य धर्मराजस्य भारत |  ३२   क
आचख्याविव तद्युद्धं विजय़ं चात्मनो महत् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति