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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
एष तालेन दीप्तेन भीष्मस्तिष्ठति पालय़न् |  १०४   क
सर्वेषां धार्तराष्ट्राणां रणे शर्म च वर्म च ||  १०४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति