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वन पर्व
अध्याय ११२
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ऋश्यशृङ्ग उवाच
स मे समाश्लिष्य पुनः शरीरं; जटासु गृह्याभ्यवनाम्य वक्त्रम् |  १२   क
वक्त्रेण वक्त्रं प्रणिधाय़ शव्दं; चकार तन्मेऽजनय़त्प्रहर्षम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति