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वन पर्व
अध्याय ११२
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ऋश्यशृङ्ग उवाच
तथा फलं वृत्तमथो विचित्रं; समाहनत्पाणिना दक्षिणेन |  १०   क
तद्भूमिमासाद्य पुनः पुनश्च; समुत्पतत्यद्भुतरूपमुच्चैः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति