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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
वाद्यं हृत्वा तु पुरुषो मशकः सम्प्रजाय़ते |  ९४   क
तथा पिण्याकसंमिश्रमशनं चोरय़ेन्नरः |  ९४   ख
स जाय़ते वभ्रुसमो दारुणो मूषको नरः ||  ९४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति