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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
ततः पश्चान्महाराज कृमिय़ोनौ प्रजाय़ते |  ९२   क
कृमिर्विंशतिवर्षाणि भूत्वा जाय़ति मानुषः ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति