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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
भर्तृपिण्डमुपाश्नन्यो राजद्विष्टानि सेवते |  ५५   क
सोऽपि मोहसमापन्नो मृतो जाय़ति वानरः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति