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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
कृमिभावमनुप्राप्तो वर्षमेकं स जीवति |  ४९   क
ततस्तु निधनं प्राप्य व्रह्मय़ोनौ प्रजाय़ते ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति