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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
अधीत्य चतुरो वेदान्द्विजो मोहसमन्वितः |  ४०   क
पतितात्प्रतिगृह्याथ खरय़ोनौ प्रजाय़ते ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति