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शान्ति पर्व
अध्याय ११२
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भीष्म उवाच
भोजने चोपहर्तव्ये तन्मांसं न स्म दृश्यते |  ४८   क
मृगराजेन चाज्ञप्तं मृग्यतां चोर इत्युत ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति