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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
अथोद्यम्य गदे घोरे सशृङ्गाविव पर्वतौ |  २२   क
तावाजघ्नतुरन्योन्यं यथा भूमिचलेऽचलौ ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति