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सभा पर्व
अध्याय ११
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नारद उवाच
यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र हरिश्चन्द्रं प्रति प्रभो |  ५२   क
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं तस्य धीमतः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति