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आदि पर्व
अध्याय १०९
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मृग उवाच
वर्तमानः सुखे दुःखं यथाहं प्रापितस्त्वय़ा |  ३०   क
तथा सुखं त्वां सम्प्राप्तं दुःखमभ्यागमिष्यति ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति