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आदि पर्व
अध्याय १०९
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मृग उवाच
मृगो भूत्वा मृगैः सार्धं चरामि गहने वने |  २७   क
न तु ते व्रह्महत्येय़ं भविष्यत्यविजानतः |  २७   ख
मृगरूपधरं हत्वा मामेवं काममोहितम् ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति