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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
भीमसेनसुतं चापि दुर्मुखः सुमुखैः शरैः |  ३७   क
षष्ट्या वीरो नदन्हृष्टो विव्याध रणमूर्धनि ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति