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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
येन वा लभते कीर्तिं येन वा लभते श्रिय़म् |  ५   क
यथा च वर्तन्पुरुषः श्रेय़सा सम्प्रय़ुज्यते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति