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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
सर्वशौचेषु व्राह्मेण तीर्थेन समुपस्पृशेत् |  १०४   क
निष्ठीव्य तु तथा क्षुत्वा स्पृश्यापो हि शुचिर्भवेत् ||  १०४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति