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आदि पर्व
अध्याय १०७
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वैशम्पाय़न उवाच
अथ द्वैपाय़नो ज्ञात्वा त्वरितः समुपागमत् |  १३   क
तां स मांसमय़ीं पेशीं ददर्श जपतां वरः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति